Thursday, 31 March 2011

“बीज” – बसंत बहार

ये सूरज की तपिश
ये वर्षा का वेग
ये पवन की रफ़्तार
ये पवन का लहराना
यही बनाता है पुष्पों का जीवन
सखी देखो फिर एक बार

आया उपवन में बसंत बहार
ये अचानक से गगन का नीलापन
ये अपने आप धरती का हरियाना
ये मन के भीतर आशा का आना
ये हृद्य का कोमल हो जाना
ये मन में अंकुर फूटना
यही बनाता है एक नया जीवन
सखी देखो एक फिर एक बार

आया जीवन में बसंत बहार
ये जो पुष्प आज खिलेंगे
बीज इनके पहले से पड़े थे
वो बीज जो कर्मो के जैसे थे
ना जाने आज खिलेंगे
या वर्षों बाद खिलेंगे
लेकिन सखी देखो आज
फिर आई बसंत बहार
जो आज ना खिले तो
अगले साल खिलेंगे
यदि ना पुष्पित हो सके तो
उनके क्या गिले होंगे
सखी ये प्रकृति की
जादू भरी है आवाज़
ये सूरज की तपिश
ये वर्षा का वेग
ये पवन का लहराना
यही बनाता है पुष्पों का जीवन
जो ना दूर से ना पास से , सुनाई नहीं देती
बस दिखती है बसन्त बहार बसंत बहार
इति
भुवनेश्वरी पाण्डेय

Wednesday, 30 March 2011

अपना पगला घर

मैंने घर बनाया तुम्हारे लाये तृणों से
उन्हें बटोर कर घर बनाया एक पगला सा |
मैं सावन की धरा तुम ले आये आसमान सारा |
कुछ रास्ते में फूल लगाये ,
         कुछ रास्तों को यूँही संवारा
साथ निभाने का जो सोचा तो ,
         आपस में बदल लीं कुछ गलतियाँ भी
आपस में बांटे वादे और,
          बाँट ली तुम्हारी खामियां भी
तुम्हारी ऊष्मा को अपने आँचल
         से ढंक कर उगने दिया वो पौधा
जो अब आँगन में देता है
         शीतल पवन और धुप में छाया भी |
मैंने घर बना डाला एक पगला सा
        तुम्हारे लाये तृणों को बटोर कर भी |
 
इति
भुवनेश्वरी पाण्डेय

Wednesday, 2 March 2011

Kavita/lekh: " मुलाकात "

Kavita/lekh: " मुलाकात ": "दिसम्बर ०५, २०१० आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई और जैसे दिन में ही रात हो गई दिखता तो था वो अपने जैसा था लेकिन देत्य जाग्रत जैसा जीवन..."

" मुलाकात "

दिसम्बर ०५, २०१०
 
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई |
दिखता तो था वो अपने जैसा
था लेकिन देत्य जाग्रत जैसा |
जीवन साथी बदल ले वो
कपड़ो की तरह |
साथी को बना के रख ले दस्यु की तरह
बात बदले, वो गिरगिट की तरह
रंग उसके बदलते हैं , मौसम  की तरह ,
जिंदगी को बना दिया , दुधारी तलवार की तरह ,
इधर गिरे , उधर फंसे ,
बढोगे तो जलोगे , थमोगे तो गलोगे |
 
एक मिले जो बेवजह मजबूर से बनते रहे
जवानी में ही बच्चो की आय खाते रहे
बुढ़ापे का गाना सुनाते रहे
कैद तो कर रखा था बच्चो को
अपनी भावनाओ के भंवर में
और जैसे दिन में ही रात हो गई |
 
कभी था पुत्री का दान
अब उसी का खाते चले
बेवजह मज़बूरी जताते चले |
लेके उधर इधर से उधर से ,
बारी बारी एक ही टोपी पहनाते  चले |
कितनो ही को तो फसाया , अपनी दोहरी चल में
ऊपर से कुछ और , भीतर से जल फेलाते चले |
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई 
माथे का तिलक जर्सी व् कुर्ता
वाणी तो मानुष जैसी , बातें स्वान जैसी 
जाने कितनो को झांसे दे के,
जिंदगी को आगे बढ़ाते चले |
कर्जो की तो बहार है यहाँ , कछुए जैसी चमड़ी हो गई 
कुछ फर्क नहीं पड़ता , नगे को नंगा करके ,
यूँ तो हमाम में सभी वैसे थे , लेकिन दिन में ही यूँ रात हो गई ,
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई  |
 
                                      इति भुवनेश्वरी पाण्डेय

"प्रतीक्षा"

जनवरी ३१, २०११
 
 
ऋतुराज तुम्हारा स्वागत है|
मै यहाँ पैदा हुआ एक वृक्ष हूँ
मुझे बसंत  राज की प्रतीक्षा है
मुझे प्रतीक्षा है उन हवाओ की ,
जो आयेंगी कुछ तपिश ले कर
यहाँ मेरा सम्पूर्ण वर्ष
बट जाता है ऋतुओ में ,
जो अति तक पहुँच कर मुझे
शिक्षा देती हैं विश्वास व् धीरज की |
 
ऋतुराज तुम्हारा स्वागत है|
 
मेरा पिछला जन्म भारत भूमि में था
जहाँ बसंत की बहार ही कुछ और थी |
वहां तो पक्षिओ की अलग चहचाहहट
ही मुझे सन्देश देने लगती थी |
तुम्हारे पदचाप की |
जो मन को गुदगुदाती थी की बस अब
कोमल कोपले मुझमे जन्मे गी
फिर पुष्पित हो कर फलित होंगी,
किन्तु यहाँ की तरह मुझे वहां तुषारपात का भय न था |
यहाँ मुझे बसंत  उत्सव मनाने का
वक्त ही कम मिलता है
अल्प काल में ही मुझे
द्रुत गति से पुष्पित पल्लवित
होने के दबाव में , प्रसंता भी देनी होती है |
पक्षी भी चहकते हैं सीमा में ही रह कर
मुझे अपने ही अस्तित्व के लिए
घोर संघर्ष करना पड़ता है |
वैसे मै धरती के दुसरे भागो की तरह ही
यहाँ भी जीवन , दृश्य व् अध्यात्म का ही
एक जीवित ज्वलंत उदाहरण हूँ
मुझे प्रतीक्षा है ऋतुराज की |
 
                            इति भुवनेश्वरी पाण्डेय
 

" सारे प्रशन "

दिसम्बर ०९, २०१०
 
सारे प्रशन मन के सागर में
अचानक डूब गए,
जैसे कुछ भी डूबने पर जल में
जो प्रतिक्रिया होती है,
हो गई |
कुछ शीतल जल के छीटे ,
हलकी सी ध्वनि
मन में उभर कर आई ,
और उसके मद्य में एक
कमल पुष्पित हो कर ऊपर उठ आया
उसमे थे अंगूठा चूसते मनोहर
पास ही धरी थी मुरली मधुर
मुख पर था हास्य मधुर
नेनो में थी चंचलता
मन ने नेनो में देखा तो
अपने होने का आभास भी जाता रहा
अचानक इतनी कृपा की आशा
जो थी नहीं ,
पूरी सी हो गई
अब तो बस वंशी के स्वर
और उसमे भीगता ये मन,
जिसके भ्रम , शंका , पाप
नष्ट  हो गए क्षण भर में |
अकारण ही पांव थिरकना चाहते ,
अकारण ही मन निंद्रा में चला जाता ,
अकारण ही सब टूट गया
अकारण ही सब छूट गया |
तन हल्का हो चला , तेरते पल्लव की तरह |
कहाँ , क्या ? सब विलीन हो गए
सारे प्रशन मन के सागर में
अचानक डूब गए |
 
                                        इति भुवनेश्वरी पाण्डेय