ये सूरज की तपिश
ये वर्षा का वेग
ये पवन की रफ़्तार
ये पवन का लहराना
यही बनाता है पुष्पों का जीवन
सखी देखो फिर एक बार
आया उपवन में बसंत बहार
ये अचानक से गगन का नीलापन
ये अपने आप धरती का हरियाना
ये मन के भीतर आशा का आना
ये हृद्य का कोमल हो जाना
ये मन में अंकुर फूटना
यही बनाता है एक नया जीवन
सखी देखो एक फिर एक बार
आया जीवन में बसंत बहार
ये जो पुष्प आज खिलेंगे
बीज इनके पहले से पड़े थे
वो बीज जो कर्मो के जैसे थे
ना जाने आज खिलेंगे
या वर्षों बाद खिलेंगे
लेकिन सखी देखो आज
फिर आई बसंत बहार
जो आज ना खिले तो
अगले साल खिलेंगे
यदि ना पुष्पित हो सके तो
उनके क्या गिले होंगे
सखी ये प्रकृति की
जादू भरी है आवाज़
ये सूरज की तपिश
ये वर्षा का वेग
ये पवन का लहराना
यही बनाता है पुष्पों का जीवन
जो ना दूर से ना पास से , सुनाई नहीं देती
बस दिखती है बसन्त बहार बसंत बहार
इति
भुवनेश्वरी पाण्डेय