Saturday, 26 February 2011

रहने दो

  
फ़ोन पर बात समाप्त करके नीलिमा रोने  लगी  थी. अब तो यहाँ से भारत फ़ोन करने   कोई परेशानी ही नहीं रहीजब इच्छा हो नंबर मिला लो और चाहे  जितनी बाते करनी हों करते रहोआज से 20-22 साल पहले जब वो यहाँ आये थे, एक फ़ोन करने के लिए Bell वालों  के दर थे प्रति मिनिट $1.39 सेंट | तब आमदनी भी ज्यादा नहीं थी | लेकिन अब तो बस घर जैसा ही हो गया  है | उसके रोने का कारण था,उसकी माँ का परलोकवास | कोई उम्र कम नहीं थी, ७३ साल की थी,   पिताजी  ७७ के   हैं | अच्छा लम्बा समय साथ बिताया था | दो  बेटियां   एक बेटा पाल पोस कर बड़े कर दिए थे| सबके घर बस चुके थे, आगे बच्चे भी हैं सबके संसारी स्तर पर कोई  शिकायत करने का अवसर नहीं था,यानि एक आम आदमी जो सोच सकता है  वो सब मिला था | सब ठीक ठाक ही कहा जायेगा |

 जब नीलिमा छोटी थी तभी से जानती थी पिताजी व माँ के बीच सामान्य नोक झोंकरूठना मनाना, शिकायतें करना  कभी  किसी बात के लिए तत्काल राज़ी होजाना या विरुद्ध रहना,  सामान्य सा थाउसे आज भी याद है उसके पति को ले कर माँ राज़ी थी, लेकिन पिता जी का कहना था, क्या सोचती हो? क्या  बेटी  को  परदेस  भटकने  को  भेज  दोगी ? पिता  जी  को  शुरू  से  ही  बड़ी  बेटी  होने  के  कारण  मोह  ज्यादा  ही था .

माँ  पिता राजी  न थे.वो  तो  भाग्य  से हारना  पड़ा  था और  वो यहाँ    गई  थी.बाकी  दो  भाई  बहिन  वहीँ  भारत  में  हैं , लेकिन  साथ  में  कोई  नहीं  रहता  , बहिन  ( छोटी ) नलिनी  दुसरे  शहर  में रहती  है , वहीँ  उसका  ससुराल  है . भाई  निलेश  उसी  शहर  में  दुसरे  मोहले  में  रहता है . माँ  जब  चाहती  उन  लोगो  के  घर  हो  लेती  थी .

यहाँ  नीलिमा  अपने  पति  नलिन  के साथ    दो १०वी   १२वी   कक्षा  के विद्यार्थी , बच्चो  के  साथ कई  साल  पहले  आई  थी. Tim Horton में  काम  करती  है. वहां  रोज  भोर  होते  ही  लोगो  का  ताँता  लग  जाता  हैकॉफ़ी सेंडविच  और न जाने क्या क्या , कतार  कटने  का  नाम  ही  नहीं  लेती , कितनी  ही  लड़कियां  लगातार  , आर्डर  लेती  रहती हैं . अति  व्यस्त  रहती  है  सुबह  , लेकिन  10 बजते  तक बुजर्गों   का  ताँता लग जाता  है , उनके  भी  क्रम  मेंएक  ठराव  सा  था,सदेव कुछ  जोड़ो में ही लोग  आते  .आरंभ  में  तो अंदाजा  लगाती  , शायद   दोनों बैठे लोग पति  पत्नी  होंगे . आखिर  ६० वर्ष  के  आस  पास  के  लोग  कोई  प्रेमी  तो  हो  नहीं  सकते  . लेकिन  बाद   में  धीरे  धीरे  , पैसे  देने  के  तरीके  से  या  एक  का  दुसरे  के  लिए  प्रतीक्षा  करना  या  साथी  के न  पहुँच पाने  पर  शीघ्रता  से  बस  डोनट  कॉफ़ी पैक करवा कर निकल  जाना , उसकी समझ   में  आ  गया  था की  वे  रिटायर्ड  लेकिन  घनिष्ट  मित्र  हैं  .पेंशन  लगी  होती है  बाकी  भी  सुविधाएँ  वृद्धा अवस्था   के  लिए उपलब्ध  होती  हैं . यदि व्यक्ति  स्वस्थ  हो  तो , वो  देखती  यहाँ  जीवन  बड़ा  सुखमय  है  वृद्धा   का .

क्या  क्या  नहीं  गति विधिया  उपलब्ध  हैं  वृद्धों   के  लिए|. दवा  लानी  हो  तो फार्मेसी   में  बस  फोन  कर दो  वो  दे  जायेंगे . दोपहर  को  कहीं  भी  कोई  न  कोई  सीनियर  क्लब  चलते  हैं  सदस्य  बन  जाओ  और  घुमो  फिरो . अब  तो  यहाँ  कार  की  सेवा  भी मिलने  लगी  है . कुछ  धन  पहले  से  जमा  कर  दो  जैसे  $१००  और  टेक्सी  का  नंबर  होता  है  फोन  करो  वे  ले  जायेंगे , घर  वापिस  छोड़  जायेंगे . और  क्या  चाहिए . बसों  के  भी किफायेती  दर  पर  माह  के  पास  मिल  जाते  हैं . जाड़ो  में  भी  अलग  प्रकार  की  सुविधाए  मिल  सकती  हैं  यदि  आप  उनको  पाने  की श्रेणी  में  होते  हैं.  

उसने  देखा  है  कभी  कभी  कुछ  वृद्ध  पति  पत्नी  जो  अपने  जीवन  साथी  को  खो  चुके  होते  हैं , बुढ़ापे  में  साथ ढूंड  लेते  हैं  फिर  रहने  लगते  है , कभी तो  विवाह  भी कर लेते  हैं , कुल  मिला  कर  जीवन  चलता  रहता  है . उसे  लगता  यहाँ  ये  सब  जीने  के  अच्छे  नज़रिए  हैं . लेकिन  भारत  में  अभी  ऐसा  नहीं| 

उसे  इसी  लिए  रोना  आ  रहा  था  की  फोन  पर  उसके  पिता  जी  ने  कहा  , बेटा  अब  जी  कर  क्या  करेंगे  , मै  जीना  नहीं  चाहता . वो  इसलिए  रोने  लगी  थी  की  अभी  तो  माँ  के  जाने  का  ही  विचार  अभी  मन्न  ने  ठीक  से  स्वीकारा नहीं  | ये  पिता  के  बिना  क्या  करेगी , किसका  सहारा  होगा  उसके  पास . वो  जानती  है  माता  पिता  के  आश्रय    के  बिना  कुछ  भी  नहीं , सब  सम्बन्ध  दूर  के  व  हलके  ही  होते  हैं . उसने  पिता  जी  से  कहा  था  , कई  बार  , आप  लोग  यहाँ  घूम  जाओ . हर  बार  माँ  कह  देती  - अरे   बेटा  अब  नए  सिरे  से  कौन  पासपोर्ट  आदि  की  झंझट  करेगा . तेरे  छोटे  भाई  को  तो  वक़्त  नहीं  रहता  , बहिन  ससुराल  में बिंधी   रहती  है , हमारा   कौन  करेगा ? हमी  लोगो  से  तू  मिल  जाया  कर . या  छुटियाँ  हो  तो  बच्चो   को  भेज  दिया  कर .यहाँ  सभी  हैं  मिलना  हो  जायेगा . नीलिमा   को  लगता  उसके  आस  पास  के  मित्र  लोगो  के  भाई  बहिन  या  माता  पिता  कभी  कभी  आते  हैं  , दो  तीन  महीने  रहते  हैं  वो  लोग  उनको  खूब  घुमाते  हैं  , मित्रो  के  घर  ले  जाते  हैं , दावते  होती  तो  अच्छा  लगता,  सुख  मिलता  है . लेकिन  उसके  यहाँ  से  कोई  नहीं  आ  पाया  अभी  तक| अब  पिता  जी  को  कहा , तो  उन्होंने  तो  जीवन  से  ही  मोह  त्याग  दिया  लगता  है |

कहाँ  वो  याद  करती  है  की  माँ  यदि  बहिन  व  भाई  के  घर  रहने  जाती , तो  पिताजी  कभी  नहीं  जाते  थे  , बल्कि  माँ  को  वापिस  जल्दी  बुलाने  में  लगे  रहते  थे . दिन  रात  का  साथ  था , खास  तोर  पर जब से पिताजी रिटायर्ड हुए . दिन  रात  की  झडपे  चल  पड़ी  थीं  , क्यों  की  माँ  की  स्वत्रंत  दिन  चर्या  में  खलल  जो  पड़ने लगी थी  . उधर   पिता  जी  को  फुर्सत  से  माँ  की  दिनचर्या  देखने  को  मिलने  लगी  थी , जो  की  पास  आने  का  एक  और  रास्ता  था . कब  नहाती  कब  और  कितनी  व  कैसी  पूजा  करती  हैं  . सब्जी  भाजी  व  फल  लेने  भी  दोनों  शाम  को थेला  उठा  लेते  व  पैदल  ही  चल  पड़ते  , सोदा  लेने , फल  तरकारी  तो  खरीदी  जाती  सो  अलग  , उनकी  फल  वाले  से  मित्रता   बड़ी  घनिष्ट  हो  चली  थी| रास्ते  में धुले कपडे भी प्रेस  करने  वाले  को  दे  आते  . ज्यादा  भार   उठा  नहीं  सकते  थे  , तो  रोज   का  काम  था  कुछ  न  कुछ  लाना  या  ले   जाना  . पास   में  ही  अच्छा  सुंदर  बगीचा  था  , बच्चो के  लिए  झूले , फिसलन , चकरी आदि  लगे  थे बड़े छायादार वृक्ष थे सुंदर  बैठने  की  बेंच  लगी  थी , तो  शाम  को  बगीचा  बैठक  आबाद कर  आते | पास  पड़ोस  के  वृद्ध  और  वृधाओं से   मिल  जुल  लेते , कभी  कभी  एक  दुसरे  के  घर  जाने  का  भी  विचार  बन  जाता  . कुल  मिलकर  माता  पिता  का  जीवन  गुजर  रहा  था . सुबह  वो  समाचार पत्र   में  घुसे  रहते  , माँ  क्रुद्ध  हो  उठती , कहती  कभी  भगवान्  को  भी  भज  लिया  करो , वक्त  कम  है| वे   हंस  कर  कहते  तुम  तो  कर  रही  हो  न  भाग्यवान  , मुझे  भी  परसाद  मिल  जायेगा| माँ  कहती  यहाँ  अपना  किया  ही  काम  आता  है  वे ठट्ठा कर  हंस  पड़ते| कभी  10 मिनिट  को  भी  ध्यान  न  धरते| माँ,  दोपहर  को  यदि  कहीं  जाना  आना  न  होता  तो  निकाल  बैठती  " राम  चरितमानस ". गाती  रहती,  लगता  रम  गई  उसी  में| फिर  शाम  की चाय  आदि  बनाने  के लिए उठती , पिता  जी  को  दोपहर  की  नींद  से जगाती ,फिर  बाकी  का  दिन  सरकता |

उसने  फोन  पर  यही  कहा  था , की  शाम  को  कहीं  चले  जाया  करिए , नलिनी  या  निलेश  के  घर, या  टहल  आया  करिए  दुकानों  तक  --- बोले  कहाँ जाऊ , तुम्हारी  माँ  के  बिना  घर  में  भी  सुना  लगता  है , कदम  बहार निकालने की हिम्मत भी  नहीं , इच्छा  भी  नहीं , सुबकते  हुए  से  कहा  था  ---- बेटा  वो  सारे रास्ते कुछ  न  कुछ  दिखाती  बताती  जाती  थी| अच्छा  लगता  था | अब  कुछ  दिखाई  नहीं  देता , अचानक ऑटो रिक्शे वाले  का होर्न डरा सा देता  है. लगता  टकरा ना जाऊ, किसी के हँसने की आवाज़  चोंका  देती  है  की  वो  कौन  होगा | मै  तो  बेटा  बिलकुल  अकेला  हो  गया  हूँ , कुछ  खाने की  इच्छा  नहीं  होती  , सुबह  नहाता  हूँ , तो  दीप  जलाते  ही   आंसू  झड़ने  लगते  हैं  तुम्हारी  माँ  की याद  में , की  कितना  कहती  थी  वो , लेकिन  जाने  क्या  मति  मारी  थी , उसके  रहते  एक  दीप ना जला  कर  दिया, अब  तो कपड़ो में  इस्त्री है या नहीं , पता  ही  नहीं  चलता , सुध  नहीं  रहती  की धुले कपड़ो  को कहाँ  रखा था या धोने  वाले कौन से  हैं |

किसी  का  फोन  आ  जाये  तो  नाम  याद  नहीं  रहता  , नाम  समझ जाऊ , तो ये  नहीं जान पाता की किस संबंध का है ये | कहने लगते बेटा नहीं पता कोई  मुझे क्यूँ फोन कर रहा होगा, बस मैं तेरी माँ के  बारे में बताने  लगता हूँ | नीलिमा का मन भरा-भरा सा रहने लगा था अब वो फोन करने से  डरती| छोटी बहिन को फोन मिलाती व पिता के  हाल  जानने  को  कहती  --- कहती  दो  चार  हफ्तों  के  लिय  तुम  चली जाओ बच्चो को ले कर, पिता जी की  देख भाल कर आओ, फिर  छोटे  भाई  भाभी को समझाती, कर्तव्य बताती, साथ ही  बताती की इन्ही दिनों के लिय तो माँ ने दूध पिलाया था, तेरे मन की  सब्जी पूरी बनाई थी , तुझे ठंडक में अपने आँचल की गर्मी  दी  थी, यही वो  दिन हैं, नलिन तू कुछ दिन रह  आ पापा  के पास , तू उस  घर से भी तो  काम पर जा  सकता  है , बाद में पछताने  से अच्छा है आज  कर ले| उनको  अपने साथ थोडा  टहला  दिया कर, बस पूछ  लिया कर, बात  किया कर, बच्चो  को छोड़ आ उनके पास , भाभी  ने  तो  कभी मन  नहीं किया. अपना भविष्य बना ले, आशीष ले ले जा चला जा| इधर  कुछ दिनों की कैनेडियन  वयस्तता  व मोसम  की मार  रही नीलिमा फोन न  कर  सकी , नलिन  का  भी  काम  कभी  कभी  शहर  से  बहार  जाने का हो जाता था, जब वो आते तो अलग  व्यस्तता  हो जाती  थी| एक दिन उसने  भारतीय  समय  के अनुसार  बड़ी  सवेरे  फोन किया, एक ही घंटी  में फोन उठ  गया , पिता जी पूजा  कर  रहे  थे , बोले  थोड़ी  देर  में बात करना| उसकी अधीरता  चरम  पर पहुँच   गई  थी, क्या  बात  हो  सकती  है ? उसने  नलिनी  को  फोन किया, पता  चला  पिता  जी  कुछ  दिन  पहले  आये  थे  रहने  ( ये  आश्चर्ये  था  दोनों  बहनों  के लिय) बहुत  सामान्य  व्यव्हार करके चले गए| लेकिन  मौन  से  थे  जैसे  किसी  भी  बात  में  उनको  रूचि  नहीं  है

नीलिमा  ने   फिर  फोन  किया  था  उधर  पिता  जी  की  आवाज़  सुन  कर  वो  चोंकी  थी| पिता  जी  ने  बिना  किसी  शिकायत  के  बात  की  व्  अंत  में  बोले  --- बस  यही  सब  करता  रहता  हूँ  , जो  पुरे जीवन तेरी माँ को  मुझसे  शिकायत  थी| अब  बस  कोई  समाचार  पत्र  नहीं, कोई  टीवी  नहीं. चाहता  हूँ  जल्दी  ही  उसके  मन पर खरा  उतरु, वो देखती होगी न मुझे ? सुनते  हैं  जीव  देह  छोड़ कर बड़े  दिनों तक  अपने प्रिये  जनो  को छोड़ नहीं  पता| तेरी  माँ  भी  मेरे  आस पास ही होगी, यहीं कहीं . मै  जैसा  हूँ  मुझे  रहने दो |

इति

भुवनेव्श्वरी   पाण्डेय