Wednesday, 13 April 2011

“टूटन”

जीवन में छोटी छोटी घटनाएँ या बातें कभी कभी बहुत गहरा अर्थ रखती हैं यदि उनको ध्यान से सुना या समझा जाये |
मधुलिका मेरठ से महेश को लेकर व् अपने दो जवान होते बछो को लेकर यहाँ कनाडा आ गई थी | जाने कौन से बल के बूते पर| या यों कहें जाने क्यूँ? होगी लाखों आने वालों की जिंदगी यहाँ भर पूर, होगी जीवन में उनके प्रगति , या होगा उनका जीवन अति संपन्न व् स्वस्थ | महेश व् मधुलिका कई सालो तक यहाँ आने के कागजात पर अंतिम निर्णय नहीं ले पे थे, फिर एक दिन, अंतिम अवसर है ये, ऐसा एक पात्र मिला था इमिग्रेशन विभाग से | और तभी पलट गया था उनका भाग्य |
कल रात भी मधुलिका ने फेक्टरी में २.३० बजे तक काम किया था उसने पति महेश को काम पर छूती होने से अधहा घंटा पहले फोन पर बताया की वो आ सकता है उसे लेने | पति की भी नींद कहाँ पूरी हो पाती है | आज चार साल हो गे इसी आशा में की दिन बदलेंगे , भाग्य उत्तरायण अवश्य होगा पर कहाँ | वर्ष के दिनों की तरह सूर्य नारायण निश्चित अवधि के आते ही उत्तरायण होने लगते हैं| वो १ बजे रात तक कुछ ना कुछ करते रह कर नींद को टालता है, कभी सोचता है पढाई कर रहे बच्चों का साथ दे रहा हूँ जाग कर , कभी ये सोच कर नहीं सोता , यार मै भी कितना गिरा हूँ पत्नी खड़ी रह कर थकी टांगो पर काम कर रही होगी और यहाँ पसरा पड़ा हूँ कोमल बिस्तर पर| कभी थकन से आँखें मुंद भी जाती , तो स्वपन में भी उसे टेलीफ़ोन की घंटी दे स्वर सुने पड़ते रहते थे| रात क्या थी बवाल थी |
जब कपडे बदल कर वह पत्नी को उठाने फैक्ट्री पहुँचता तो रोज उसे आशा सी होती (धूमिल ही सही ) की आज शायद हलके काम के कारण मधुलिका उसे मुस्कुरा कर देख लेगी | लेकिन ऐसा एक दिन भी नहीं होता था | पर वह भी क्या करे | पत्नी को काम का तनाव व् सुपरवाइजर का दबाव इतना रहता की पूरे रास्ते वे डर के मरे कुछ बात ना कर पाते |
ऊपर वाले ने सबों का सवभाव भिन्न बना कर भेजा है , सो इनके घर में भी वही स्थिति थी | पत्नी बिना बोले कपडे बदलती, सुबह जब , सबका उठने का समय होता (ब्रम्हमहूर्त) वो हाथ मुह धोती , कुछ खाती, चैन से बैठ कर , क्यूंकि वहाँ फेक्ट्री में जो भी वो खाती बस खाना पूरी के लिए , स्वाद कुछ ना आता था | खाते हुये उसे देख कर महेश का मन भीतर से टूट जाता, रोता सा बिस्तर पर एक तरफ लुडक जाता कि वो आयेगी तो उसे सलहा देगा | परन्तु जब अपना पूरा समय लेकर मधुलिका दूसरी तरफ लुडक जाती तो मृत प्राय होती | उसे सुध ना रहती, कुछ भी , न लोगो की, ना वक्त की |
मधुलिका ही तो तीन बजे सोई है बच्चों को तो कॉलेज जाना होता है, वे दबे पांव उठते, धीरे से नहाते धोते तब तक ७ बजते बजते देखते लडखडाती माँ सामने आ रही है| मात् भाव उसे सोने नहीं देता, कुछ बना कर दे दूँ इन्हें आखिर दिन भर के लिए बच्चे चले जायेंगे , इनका क्या दोष जो सहें| एक अजीब रूआंसा सा वातावरण रहता | घंटे दो घंटे तभी महेश भी आठ बजे अपनी ड्यूटी पर जाने को तेयार हो रहा होता |
सभी टूटे से रहते जरा भी तेज नज़र पड़ी या ज़रा भी तीखी आवाज़ हुई की पूरा टूट जायेंगे ऐसा ही लगता रहता| सभी संभल के चलते रहते |
बच्चे १८ व् २० साल के थे यूँ तो उनको बेबी सिटिंग वाली समस्या नहीं सहनी पड़ी लेकिन ये सच है हर उम्र की अपनी ही समस्याएँ सामने खड़ी रहती हैं| किसी में दम है तो जीत के दिखाए| वहाँ मेरठ में तो २०-२२ साल की लड़कियों की शादी की चर्चा चल पड़ती है और माँ बाप जरा बड़े हो जाते हैं| लड़कियां जरा शर्माने लगती हैं घर का वातावरण एक अलग ही सभ्यता के पवन झोकों में बहता रहता है |एक सुगंध होती है घर में जवान बेटी की| माँ की ममता की पिता के सरंक्षण की | और भाई की चुहल कदमी की | हंसी खुशी का साम्राज्य रहता है घर में |
मधुलिका जब चार साल पहले आई थी तो आस पास जो पुराने लोग ( भारतीय ) देखती , उनके बच्चों के विवाह देखती तो फूली नहीं समाती| दिवास्वप्न हो या रात्रिस्वप्न हो बेटी का घर बसा देखने की आतुरता जाहिर होती रहती | लेकिन कहाँ खबर थी कि ये कनाडा है , जब तक मजबूत ना हो जाएँ ( धन, घर, कार ) पूरी तरह , अपना कुछ सोचते ही नहीं | बड़ा फर्क महसूस होता महेश को, वे अपने भारत में जमा धन, जमीन, मकान आदि का आये दिन अंदाज़ा लगते रहता कि इतना तो है कि एक बेटी अच्छे से ब्याही जायेगी | उन्हें कहाँ तब पता था यहाँ जो चाहिए वो मेरठ कि सीधी साधी कन्या नहीं | बल्कि खूब स्मार्ट पड़ी लिखी , कार चलाती, वाचाल चतुर लड़की चाहिए | अब वो वक़्त नहीं रहा कि बेटियां बस घर सँभालने को लाई जाती थी| अब उनकी कठिनाइयाँ चोतरफा बढ़ गई हैं | देखने में अच्छीहो , पतली हो , अच्छा मेकप जानती हो सोसाइटी कि पूरी खबर हो ओर भी ना जाने क्या क्या | चाहे पकाना ना जानती हो लेकिन बाते करती हो उसकी| खेर
जब कोई यहाँ आता है सभी कहते हैं भाई अभी तो बेसमेंट में ही रह लो , साल के बाद काम काज जब जम जायेगा, अपना घर ले लेना | मधुलिका ने वाहन काम नहीं किया था , पति धनोपार्जन करते थे पूरा घर प्रसन्न था| काम करना, वो भी इतनी विषम परिस्थितिओं में, वो अब टूटने लगी थी| इसी बीच परिवार कि किसी शादी में उन्हें भारत जाना पड़ा| शादी बड़ी धूम धाम से हुई दामाद डॉ मिल गया था| लोग – रिश्तेदार फुले नहीं समा रहे थे| ये अपनी और से अपनी वास्तविक स्थिति (आर्थिक) को छुपाते हुए सबके लिए उपहार भेंट खूब ले गए थे| परन्तु वाहन जब देखा वाही लोग , जो इनके रहते, दीन बने रहते थे जगमगाहट दिखा रहे थे इन्हें पहली बार एहसास हुआ कि वे भारत में ही अच्छे थे| कनाडा में तो अभी स्थिति सुधरने में सालो लग जाएंगे| स्थिति पलट चुकी थी , भारी मन से वापिस आये, जमा डालर वाहन लुटा आये, अब फिर मेहनत शुरू हुई और रास्ता इतना लंबा लगने लगा कि क्या करें, क्या कहें | ऊपर से ये डर भी लाए साथ ही , अगर कोई रिश्तेदार आ गए तो उन्हें ये लोग बिठाएंगे कहाँ , लिटाएंगे कहाँ, घूमेंगे कैसे ?
पडोसी मित्रों ने ढाढस बधाया, अपने तरीके से उन्हें ये भी समझाया कि इतनी जल्दी कोई इतना रुपया लगा कर नहीं आयेगा किन्तु मधुलिका रोज बेचैन रहने लगी| फोन पर झूट बोलती रहती थी , अपनी अवस्था को ढकने के लिए, अब सवाल खड़ा था क्या करेगी |
बच्चों कि पढ़ाई यहाँ कहते हैं अच्छी है| लेकिन भारत में आधी करके अचानक बिना योजना बनाये कॉलेज व् युनिवेर्सिटी में प्रवेश मिलना कठिन होता है , सब चीजे समझने में वक्त लगता है फिर अंग्रेजी का भूत तो तांडव करता ही रहता है यहाँ अलग अलग समय (माह ) में क्रेडिट शुरू होते हैं , शाम कि कक्षाएं अलग चलती हैं सारा चलन समझने में कितनी ही चीजे छूटती चली जाती हैं| मनन में इर्ष्या, असफलता का भय उगने लगता है|
असफलता का भय तो महेश व् मधुलिका को जितना हो रहा है भारत से लोटने के बाद कि उसे जाते जाते कुछ साल तो लग ही जायेंगे| अपने मन का कुछ ज्यादा खरीद नहीं पाते| पुराने लोग, सहानुभूति में या वास्तविक स्थिति को समझते हुये या अपने दिन याद करके कुछ न कुछ देने कि योजना बनाते व् उनके सामने रखते, मज़बूरी में सब सहना पड़ता| वर्ना क्या कमी थी वहाँ, क्या किसी का प्रयोग (इस्तेमाल, यूज्ड ) किया, कुछ कभी लिया था उन्होंने| मधुलिका बाजार से जा कर मन चाहा सब लाती रहती थी|
यहाँ कि ठंडक ने भी उन सबको कहीं ना कहीं तोडा है , बस टूटन बिखराव नहीं बनी यहाँ , ऊपर वाले कि असीम कृपा है | जवान लड़के देख कर पति पत्नी प्यार से भर जाते, बच्चे रात देर तक पड़ते, माता पिता विभोर हो उठते, आँखे मुंद कर सफलता कि कामना करते, लेकिन सफलता तो जब आयेगी तभी आयेगी| आज का दिन देखो, बच्चों को गाडी चलाना, सीखना, उनका इन्शोरेन्स, बड़े बच्चों के बड़े खर्चे, अजनबी शहर में मित्र बनाना भी क्या सरल था| ये कठिनाई भी बच्चों को अंतर्मुखी करती जा रही थी | मधुलिका व् महेश के अकेले ही व्यावहारिक होने से कहाँ पूरा पड़ता है,आए दिन काम पर, काम छूटने का डर, फिर घंटे कम होने का डर इन्ही के रहते स्वस्थ भी तो बिगड़ता है| चाहे कितनी भी चिकित्सिक सहायता मिले इस उम्र में लग गए रोग आगे जा कर बहुत दुःख देते हैं जैसे सर दर्द, बंदी हवा से जकड़ी हड्डियां, बर्फ में गिर जाने के बाद कि तकलीफ, फिर एक ही कार, जाने वाले चार, चलने वाला एक उपर से बर्फ में गलती हो न हो यदि टक्कर मार दी किसी ने उसका एक अतिरिक भुगतान, ये सब नये आए लोगो कि अलग समस्याएं हैं |
अब तो किराया देने में भी रोकड़ा नगद मांगते हैं उस से मकान मालिक तो फायेदा है लेकिन बेसमेंट में रह रहे नए भारतीय को आर्थिक समस्याएं हो जाती हैं| मधुलिका सब देख समझ रही है| बस अपने वक्त कि प्रतीक्षा है इसी प्रतीक्षा में वह वाचाल से मौन हो चली है | बेटी कि शादी भी तभी होगी जब होगी| बदन कि टूटन वो गरम चाय पी कर, या लैपटॉप पर इन्टरनेट के जरिये भारत से संपर्क रख कर या पुरानी कोई मनपसंद फिल्म देख कर, या बच्चों व् पति के मन पसंद का भोजन पका कर सहन कर रही है| उसे पता है प्रति दिन प्रकति येही सन्देश दे रही है, सब दिन जात ना एक समान| कभी दिन लंबे तो कभी रात लंबी होती है| कभी आकाश खूब नीला हरी घास होती है, कभी श्वेत हर तरफ कभी भगवान अपनी चित्रकला से सब रंग देते हैं |
अभी कुछ देर पहले ही मधुलिका मकान मालकिन को $८०० नगद दे कर ऊपर आई तो महेश का फोन आ गया , फोन पर हलो कहते से ही उसे लगा, कुछ गडबड है , उस तरफ से महेश कहने लगे| अरे बड़ी कठिन स्थिति आ गई है शायद ये कंपनी मिस्सिस्सगा से किसी दूसरे सबर्ब में “मूव” होने वाली है | क्या करेंगे अभी कुछ दिन ही तो हुए हैं इस नहीं बेसमेंट में आए हुए | बच्चों का क्या होगा, त्तुम्हारी नौकरी का क्या होगा? ना जाने कितने प्रश्न दोनों दे बीच में खड़े हो गए थे |
सब काम बीच में पड़े हैं दूसरे शहर जाना उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे किसी ने घर से निकल दिया हो| किस से व्यथा कहें , किस से सलहा लें , दो घर चलने का तो वो अभी सोच ही नहीं सकते| बड़ी मुश्किल से दोनों के काम करने से गाडी खिंच रही है| आए दिन कोई ना कोई छोटा बड़ा खर्च निकल ही आता है |
मधुलिका कि हिम्मत टूट गई वो अचानक रोने लगी | उस समय बच्चे भी नहीं थे, घर पर वो नितांत अकेली थी | कहने को तो महेश से उसने बड़ी शांति से कह दिया था कि चलो सोचते हैं, देखेंगे जो होगा संभल लेंगे| उधर महेश भी कमजोर सा होकर वाली जगह पर कुर्सी में जैसे ढ़ह सा गया था आज चार साल में उसे सबसे ज्यादा घबराहट होने लगी थी उसे लगा, बस टूट गया हूँ, क्या करूँ?
भुवनेश्वरी पाण्डेय ( ४ फरवरी , २०११)

Thursday, 31 March 2011

“बीज” – बसंत बहार

ये सूरज की तपिश
ये वर्षा का वेग
ये पवन की रफ़्तार
ये पवन का लहराना
यही बनाता है पुष्पों का जीवन
सखी देखो फिर एक बार

आया उपवन में बसंत बहार
ये अचानक से गगन का नीलापन
ये अपने आप धरती का हरियाना
ये मन के भीतर आशा का आना
ये हृद्य का कोमल हो जाना
ये मन में अंकुर फूटना
यही बनाता है एक नया जीवन
सखी देखो एक फिर एक बार

आया जीवन में बसंत बहार
ये जो पुष्प आज खिलेंगे
बीज इनके पहले से पड़े थे
वो बीज जो कर्मो के जैसे थे
ना जाने आज खिलेंगे
या वर्षों बाद खिलेंगे
लेकिन सखी देखो आज
फिर आई बसंत बहार
जो आज ना खिले तो
अगले साल खिलेंगे
यदि ना पुष्पित हो सके तो
उनके क्या गिले होंगे
सखी ये प्रकृति की
जादू भरी है आवाज़
ये सूरज की तपिश
ये वर्षा का वेग
ये पवन का लहराना
यही बनाता है पुष्पों का जीवन
जो ना दूर से ना पास से , सुनाई नहीं देती
बस दिखती है बसन्त बहार बसंत बहार
इति
भुवनेश्वरी पाण्डेय

Wednesday, 30 March 2011

अपना पगला घर

मैंने घर बनाया तुम्हारे लाये तृणों से
उन्हें बटोर कर घर बनाया एक पगला सा |
मैं सावन की धरा तुम ले आये आसमान सारा |
कुछ रास्ते में फूल लगाये ,
         कुछ रास्तों को यूँही संवारा
साथ निभाने का जो सोचा तो ,
         आपस में बदल लीं कुछ गलतियाँ भी
आपस में बांटे वादे और,
          बाँट ली तुम्हारी खामियां भी
तुम्हारी ऊष्मा को अपने आँचल
         से ढंक कर उगने दिया वो पौधा
जो अब आँगन में देता है
         शीतल पवन और धुप में छाया भी |
मैंने घर बना डाला एक पगला सा
        तुम्हारे लाये तृणों को बटोर कर भी |
 
इति
भुवनेश्वरी पाण्डेय

Wednesday, 2 March 2011

Kavita/lekh: " मुलाकात "

Kavita/lekh: " मुलाकात ": "दिसम्बर ०५, २०१० आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई और जैसे दिन में ही रात हो गई दिखता तो था वो अपने जैसा था लेकिन देत्य जाग्रत जैसा जीवन..."

" मुलाकात "

दिसम्बर ०५, २०१०
 
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई |
दिखता तो था वो अपने जैसा
था लेकिन देत्य जाग्रत जैसा |
जीवन साथी बदल ले वो
कपड़ो की तरह |
साथी को बना के रख ले दस्यु की तरह
बात बदले, वो गिरगिट की तरह
रंग उसके बदलते हैं , मौसम  की तरह ,
जिंदगी को बना दिया , दुधारी तलवार की तरह ,
इधर गिरे , उधर फंसे ,
बढोगे तो जलोगे , थमोगे तो गलोगे |
 
एक मिले जो बेवजह मजबूर से बनते रहे
जवानी में ही बच्चो की आय खाते रहे
बुढ़ापे का गाना सुनाते रहे
कैद तो कर रखा था बच्चो को
अपनी भावनाओ के भंवर में
और जैसे दिन में ही रात हो गई |
 
कभी था पुत्री का दान
अब उसी का खाते चले
बेवजह मज़बूरी जताते चले |
लेके उधर इधर से उधर से ,
बारी बारी एक ही टोपी पहनाते  चले |
कितनो ही को तो फसाया , अपनी दोहरी चल में
ऊपर से कुछ और , भीतर से जल फेलाते चले |
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई 
माथे का तिलक जर्सी व् कुर्ता
वाणी तो मानुष जैसी , बातें स्वान जैसी 
जाने कितनो को झांसे दे के,
जिंदगी को आगे बढ़ाते चले |
कर्जो की तो बहार है यहाँ , कछुए जैसी चमड़ी हो गई 
कुछ फर्क नहीं पड़ता , नगे को नंगा करके ,
यूँ तो हमाम में सभी वैसे थे , लेकिन दिन में ही यूँ रात हो गई ,
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई  |
 
                                      इति भुवनेश्वरी पाण्डेय

"प्रतीक्षा"

जनवरी ३१, २०११
 
 
ऋतुराज तुम्हारा स्वागत है|
मै यहाँ पैदा हुआ एक वृक्ष हूँ
मुझे बसंत  राज की प्रतीक्षा है
मुझे प्रतीक्षा है उन हवाओ की ,
जो आयेंगी कुछ तपिश ले कर
यहाँ मेरा सम्पूर्ण वर्ष
बट जाता है ऋतुओ में ,
जो अति तक पहुँच कर मुझे
शिक्षा देती हैं विश्वास व् धीरज की |
 
ऋतुराज तुम्हारा स्वागत है|
 
मेरा पिछला जन्म भारत भूमि में था
जहाँ बसंत की बहार ही कुछ और थी |
वहां तो पक्षिओ की अलग चहचाहहट
ही मुझे सन्देश देने लगती थी |
तुम्हारे पदचाप की |
जो मन को गुदगुदाती थी की बस अब
कोमल कोपले मुझमे जन्मे गी
फिर पुष्पित हो कर फलित होंगी,
किन्तु यहाँ की तरह मुझे वहां तुषारपात का भय न था |
यहाँ मुझे बसंत  उत्सव मनाने का
वक्त ही कम मिलता है
अल्प काल में ही मुझे
द्रुत गति से पुष्पित पल्लवित
होने के दबाव में , प्रसंता भी देनी होती है |
पक्षी भी चहकते हैं सीमा में ही रह कर
मुझे अपने ही अस्तित्व के लिए
घोर संघर्ष करना पड़ता है |
वैसे मै धरती के दुसरे भागो की तरह ही
यहाँ भी जीवन , दृश्य व् अध्यात्म का ही
एक जीवित ज्वलंत उदाहरण हूँ
मुझे प्रतीक्षा है ऋतुराज की |
 
                            इति भुवनेश्वरी पाण्डेय
 

" सारे प्रशन "

दिसम्बर ०९, २०१०
 
सारे प्रशन मन के सागर में
अचानक डूब गए,
जैसे कुछ भी डूबने पर जल में
जो प्रतिक्रिया होती है,
हो गई |
कुछ शीतल जल के छीटे ,
हलकी सी ध्वनि
मन में उभर कर आई ,
और उसके मद्य में एक
कमल पुष्पित हो कर ऊपर उठ आया
उसमे थे अंगूठा चूसते मनोहर
पास ही धरी थी मुरली मधुर
मुख पर था हास्य मधुर
नेनो में थी चंचलता
मन ने नेनो में देखा तो
अपने होने का आभास भी जाता रहा
अचानक इतनी कृपा की आशा
जो थी नहीं ,
पूरी सी हो गई
अब तो बस वंशी के स्वर
और उसमे भीगता ये मन,
जिसके भ्रम , शंका , पाप
नष्ट  हो गए क्षण भर में |
अकारण ही पांव थिरकना चाहते ,
अकारण ही मन निंद्रा में चला जाता ,
अकारण ही सब टूट गया
अकारण ही सब छूट गया |
तन हल्का हो चला , तेरते पल्लव की तरह |
कहाँ , क्या ? सब विलीन हो गए
सारे प्रशन मन के सागर में
अचानक डूब गए |
 
                                        इति भुवनेश्वरी पाण्डेय