Wednesday, 2 March 2011

" मुलाकात "

दिसम्बर ०५, २०१०
 
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई |
दिखता तो था वो अपने जैसा
था लेकिन देत्य जाग्रत जैसा |
जीवन साथी बदल ले वो
कपड़ो की तरह |
साथी को बना के रख ले दस्यु की तरह
बात बदले, वो गिरगिट की तरह
रंग उसके बदलते हैं , मौसम  की तरह ,
जिंदगी को बना दिया , दुधारी तलवार की तरह ,
इधर गिरे , उधर फंसे ,
बढोगे तो जलोगे , थमोगे तो गलोगे |
 
एक मिले जो बेवजह मजबूर से बनते रहे
जवानी में ही बच्चो की आय खाते रहे
बुढ़ापे का गाना सुनाते रहे
कैद तो कर रखा था बच्चो को
अपनी भावनाओ के भंवर में
और जैसे दिन में ही रात हो गई |
 
कभी था पुत्री का दान
अब उसी का खाते चले
बेवजह मज़बूरी जताते चले |
लेके उधर इधर से उधर से ,
बारी बारी एक ही टोपी पहनाते  चले |
कितनो ही को तो फसाया , अपनी दोहरी चल में
ऊपर से कुछ और , भीतर से जल फेलाते चले |
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई 
माथे का तिलक जर्सी व् कुर्ता
वाणी तो मानुष जैसी , बातें स्वान जैसी 
जाने कितनो को झांसे दे के,
जिंदगी को आगे बढ़ाते चले |
कर्जो की तो बहार है यहाँ , कछुए जैसी चमड़ी हो गई 
कुछ फर्क नहीं पड़ता , नगे को नंगा करके ,
यूँ तो हमाम में सभी वैसे थे , लेकिन दिन में ही यूँ रात हो गई ,
आज एक अमानुष से मुलाकात हो गई
और जैसे दिन में ही रात हो गई  |
 
                                      इति भुवनेश्वरी पाण्डेय

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