दिसम्बर ०९, २०१०
सारे प्रशन मन के सागर में
अचानक डूब गए,
जैसे कुछ भी डूबने पर जल में
जो प्रतिक्रिया होती है,
हो गई |
कुछ शीतल जल के छीटे ,
हलकी सी ध्वनि
मन में उभर कर आई ,
और उसके मद्य में एक
कमल पुष्पित हो कर ऊपर उठ आया
उसमे थे अंगूठा चूसते मनोहर
पास ही धरी थी मुरली मधुर
मुख पर था हास्य मधुर
नेनो में थी चंचलता
मन ने नेनो में देखा तो
अपने होने का आभास भी जाता रहा
अचानक इतनी कृपा की आशा
जो थी नहीं ,
पूरी सी हो गई
अब तो बस वंशी के स्वर
और उसमे भीगता ये मन,
जिसके भ्रम , शंका , पाप
नष्ट हो गए क्षण भर में |
अकारण ही पांव थिरकना चाहते ,
अकारण ही मन निंद्रा में चला जाता ,
अकारण ही सब टूट गया
अकारण ही सब छूट गया |
तन हल्का हो चला , तेरते पल्लव की तरह |
कहाँ , क्या ? सब विलीन हो गए
सारे प्रशन मन के सागर में
अचानक डूब गए |
इति भुवनेश्वरी पाण्डेय
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