मैंने घर बनाया तुम्हारे लाये तृणों से
उन्हें बटोर कर घर बनाया एक पगला सा |
मैं सावन की धरा तुम ले आये आसमान सारा |
कुछ रास्ते में फूल लगाये ,
कुछ रास्तों को यूँही संवारा
साथ निभाने का जो सोचा तो ,
आपस में बदल लीं कुछ गलतियाँ भी
आपस में बांटे वादे और,
बाँट ली तुम्हारी खामियां भी
तुम्हारी ऊष्मा को अपने आँचल
से ढंक कर उगने दिया वो पौधा
जो अब आँगन में देता है
शीतल पवन और धुप में छाया भी |
मैंने घर बना डाला एक पगला सा
तुम्हारे लाये तृणों को बटोर कर भी |
इति
भुवनेश्वरी पाण्डेय
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